अदबी दुनिया: एक युग का अंत और कविता सृजन के नए आयाम
साहित्य जगत और शायरी की दुनिया के लिए आज का दिन बेहद गमगीन है। अपनी अनूठी अदायगी और बेबाक लफ्जों के लिए मशहूर शायर डॉ. राहत इंदौरी का कोरोना संक्रमण से जूझते हुए निधन हो गया है। राहत साहब केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि वह मुशायरों की जान थे। अगर गज़ल को इशारों की कला माना जाता है, तो राहत इंदौरी वह कलाकार थे जो अपने खास अंदाज़ में झूमकर इस कला को एक नया मुकाम देते थे। उनके जाने से उर्दू शायरी के एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया है।
राहत का अंदाज़: मोहब्बत और बगावत का संगम
राहत इंदौरी की खासियत यह थी कि उनके शेर सीधे दिल में उतरते थे। वे अपनी गज़लों के माध्यम से न केवल मोहब्बत की नई शुरुआत करते थे, बल्कि समाज और व्यवस्था में ज़रूरी हस्तक्षेप भी करते थे। सत्ता को आईना दिखाना हो या आम आदमी के दर्द को बयां करना हो, उनका लहज़ा हमेशा बुलंद रहा। उनके निधन के बाद उनके कुछ मशहूर शेर आज हर जुबान पर हैं, जो उनकी शख्सियत की गवाही देते हैं।
उनके तेवर का अंदाजा इन पंक्तियों से लगाया जा सकता है: “तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो, मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो।”
वे हालात पर कटाक्ष करने में भी पीछे नहीं रहते थे: “ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे, जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे।”
सत्ता और सिस्टम पर उनकी चोट बेहद तीखी होती थी: “फकीरी पे तरस आता है, अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है, जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे।”
और इश्क़ के मामले में भी उनका अंदाज़ निराला था: “जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे, मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे।”
“फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो, इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो।”
लेखन की नई राहें: खेल-खेल में कविता
जहाँ एक तरफ हम राहत साहब जैसे दिग्गजों की विरासत को याद कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कविता और लेखन की दुनिया में नए प्रयोग भी हो रहे हैं जो नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का काम कर रहे हैं। कविता लिखना केवल एक ईश्वरीय उपहार नहीं, बल्कि एक कौशल भी है जिसे तराशा जा सकता है। इसी दिशा में कवयित्री और बोर्ड गेमर इंद्राणी परेरा एक अनूठी वर्कशॉप लेकर आई हैं, जिसका नाम है ‘प्लेइंग विद पोएट्री’ यानी कविता के साथ खेल।
यह वर्कशॉप इस बात का प्रमाण है कि लेखन की प्रक्रिया बोझिल नहीं होनी चाहिए। इंद्राणी का मानना है कि खेल सिर्फ बच्चों के लिए नहीं होता; यह वयस्कों के दिमाग को भी सक्रिय करता है, सोचने की क्षमता बढ़ाता है और रचनात्मकता को नई दिशा देता है—और एक कवि के लिए ये सभी गुण बेहद ज़रूरी हैं।
रचनात्मकता का अनोखा तरीका
इस वर्कशॉप में प्रतिभागी अपना खुद का ‘पोएट्री गेम’ बनाना सीखते हैं। इसमें पांसे (डाइस) को कस्टमाइज़ करना, अपने शब्दों का बैंक तैयार करना और वर्ड कार्ड्स बनाना शामिल है। इस प्रक्रिया के ज़रिए लोग डर को पीछे छोड़कर गलतियों को अपनाना सीखते हैं और लेखन का आनंद लेते हैं। यहाँ न केवल कविताएँ लिखी जाती हैं, बल्कि रूपक (मेटाफर) गढ़ना और ‘मोनोस्टिक’ (एक पंक्ति वाली कविता) लिखना भी सिखाया जाता है। सबसे खास बात यह है कि इस सत्र में सीखे गए कौशल का उपयोग केवल कविता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे लघुकथाओं और गैर-काल्पनिक (नॉन-फिक्शन) लेखन में भी अपनाया जा सकता है। यह वर्कशॉप प्रतिभागियों को अपनी संस्कृति और विरासत से जुड़कर शब्द गढ़ना सिखाती है।
कौन हैं इंद्राणी परेरा?
इस वर्कशॉप का नेतृत्व करने वाली इंद्राणी परेरा एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। श्रीलंकाई, जर्मन और ऑस्ट्रेलियाई मूल की यह कवयित्री ‘पॉकेट्री अल्मनैक’ की संपादक और ‘सर्कस ऑफ सिमिलीज’ की निर्माता हैं। उनकी कविताएँ मेलबर्न राइटर्स फेस्टिवल में बड़ी स्क्रीन से लेकर पुस्तकालय की रसीदों तक पर छप चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दुनिया भर की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं और उन्हें कई प्रमुख कविता पुरस्कारों के लिए नामांकित भी किया गया है। इंद्राणी पर्थ पोएट्री फेस्टिवल में नेशनल गेस्ट पोएट भी रह चुकी हैं।